बागपत के बड़ागांव में दशहरे पर रावण दहन और रामलीला नहीं होती। ग्रामीण रावण को पूर्वज मानकर पूजते हैं। मां मंशादेवी मंदिर की परंपरा से जुड़ी मान्यता आज भी कायम है।
बड़ागांव में नहीं होता रावण दहन, लोग मानते हैं पूर्वज
बागपत। देशभर में दशहरा पर रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतले दहन होते हैं। लेकिन बागपत जिले के बड़ागांव में यह परंपरा नहीं है। यहां के लोग रावण को अपना पूर्वज मानते हैं।
गांव के बुजुर्गों का मानना है कि रावण ने मां मंशादेवी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया था। तपस्या के बाद मां का शक्तिपुंज इसी गांव में विराजमान हो गया। तभी से गांव बसा और इसे रावण का खेड़ा कहा जाने लगा।
गांव के प्रधान दिनेश त्यागी ने बताया कि त्रेता युग में रावण मां मंशादेवी को लंका ले जाना चाहता था। वह हिमालय से मां का शक्तिपुंज लेकर चला। रास्ते में उसे लघुशंका लगी। उसने ग्वाले को शक्तिपुंज पकड़ा दिया और जमीन पर न रखने की ताकीद की। लेकिन ग्वाला मां का तेज सहन नहीं कर सका और उसे जमीन पर रख दिया। तभी से मां यहीं विराजमान हो गईं।
सिद्धपीठ मां मंशा देवी मंदिर के पुजारी गौरी शंकर ने बताया कि रावण के कारण ही यह गांव बसा था। इसलिए यहां के लोग रावण को पूजनीय मानते हैं। दशहरे पर न रामलीला होती है और न ही रावण का पुतला दहन।
शहर में दशहरे की धूम
बागपत शहर में दूसरी ओर दशहरे की तैयारियां पूरी हो गई हैं। दो स्थानों पर रावण के पुतले जलाए जाएंगे। लवकुश रामलीला कमेटी दिगंबर जैन डिग्री कालेज के सी फील्ड में पुतला दहन करेगी। वहीं श्री प्रेम मंडल कमेटी ठाकुरद्वारा मंदिर परिसर में रावण दहन करेगी।
तैयारियों को परखने के लिए डीएम अस्मिता लाल और एसपी सूरज कुमार राय ने पुलिस बल के साथ निरीक्षण किया। भीड़ की सुरक्षा के लिए सी फील्ड में निकासी के दो द्वार खोले गए हैं।
लवकुश रामलीला कमेटी पंचमुखी शिव मंदिर में रामलीला का मंचन कर रही है। गुरुवार को सी फील्ड में रावण दहन का आयोजन धूमधाम से होगा।

























