अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने H-1B वीज़ा पर नया नियम लागू किया है। अब H-1B वीज़ा के लिए हर साल 1 लाख डॉलर यानी करीब 80 लाख रुपये शुल्क देना होगा। इसका असर भारत और चीन के हाई स्किल्ड कर्मचारियों पर पड़ेगा।
ट्रंप का झटका : H-1B वीज़ा पर अब हर साल 80 लाख रुपये
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने H-1B वीज़ा को लेकर बड़ा फैसला लिया है। अब इस वीज़ा पर हर साल 1 लाख अमेरिकी डॉलर यानी करीब 80 लाख रुपये का शुल्क देना होगा। यह नियम 21 सितंबर 2025 से लागू होगा।
क्या है H-1B वीज़ा
H-1B वीज़ा उन विदेशी लोगों को दिया जाता है जो हाई स्किल्ड नौकरियों के लिए योग्य होते हैं। खासतौर पर टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, साइंस और मैथ्स के क्षेत्रों में। यह वीज़ा 1990 से लागू है। हर साल इसकी संख्या 85,000 तय की जाती है। वीज़ा तीन साल के लिए वैध होता है और इसे आगे भी बढ़ाया जा सकता है।
ट्रंप सरकार का तर्क
ट्रंप प्रशासन का कहना है कि कंपनियां इन वीज़ा धारकों को कम वेतन देकर काम करा रही हैं। विदेशी कर्मचारी सालाना 60,000 डॉलर पर भी तैयार हो जाते हैं। वहीं, अमेरिकी कर्मचारियों को 1 लाख डॉलर से ज्यादा सैलरी देनी पड़ती है। सरकार का दावा है कि नया शुल्क विदेशी वर्करों की संख्या कम करेगा और अमेरिकी नागरिकों को ज्यादा मौके देगा।

भारत पर असर
रिपोर्ट्स के अनुसार, 2023 में जारी H-1B वीज़ा में 73% भारतीयों को और 12% चीन के नागरिकों को मिले थे। भारत से बड़ी संख्या में आईटी प्रोफेशनल अमेरिका जाते हैं। नया शुल्क स्टार्टअप और छोटी टेक कंपनियों के लिए बड़ी समस्या बनेगा।
विशेषज्ञों की राय
पूर्व सलाहकार अजय भुटोरिया ने कहा कि यह कदम स्टार्टअप्स के लिए मुश्किल पैदा करेगा। हालांकि उन्होंने इसे अमेरिकी टैलेंट और नौजवान ग्रेजुएट्स के लिए अवसर बढ़ाने वाला बताया।
फाउंडेशन ऑफ इंडिया एंड इंडियन डायस्पोरा स्टडीज ने इस फैसले को ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ कहा। संस्था का मानना है कि इससे अमेरिकी तकनीकी उद्योग और भारतीय टैलेंट दोनों को नुकसान होगा।
कंपनियों की चुप्पी
अमेज़न, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और एप्पल जैसी बड़ी कंपनियों ने अब तक इस फैसले पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि टेक सेक्टर इससे खुश नहीं है।


























